विरह व्यथा से व्यतीत द्रवित हो, वन वन भटके राम

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आश्रम देखि जानकी हीना, भए बिकल जस प्राकृत दीना।।

विरह व्यथा से व्यतीत द्रवित हो, वन वन भटके राम-२।
अपनी सिया को, प्राण पिया को, पग पग ढूंढे राम।
विरह व्यथा से व्यतीत द्रवित हो……

कुंजन माहि न सरिता तीरे, विरह विकल रघुवीर अधीरे।
हे खग मृग हे मधुकर शैनी, तुम देखी सीता मृग नयनी।
वृक्ष लता से, जा से ता से, पूछत डोले राम।
विरह व्यथा से व्यतीत द्रवित हो……

फागुन खानी जानकी सीता, रूप शील व्रत नाम पुनीता।
प्राणाधिका घनिष्ट सनेही, कबहु ना दूर भई वैदेही।
श्री हरि जू श्री हीन सिया विन, ऐसे लागे राम।

विरह व्यथा से व्यतीत द्रवित हो, वन वन भटके राम-२।
अपनी सिया को, प्राण पिया को, पग पग ढूंढे राम।
विरह व्यथा से व्यतीत द्रवित हो……

 

रचना और संगीत: रवीन्द्र जैन
स्वर: मोहम्मद अज़ीज
प्रस्तुतकर्ता: रामानंद सागर

https://youtu.be/MAdGirv10JQ

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Yogi Anand Adwait

Sri Yogi Anand is an ordained Himalayan Yogi, Yoga Mediation Master, Spiritual Guru, Life Coach, Writer, Eloquent Speaker, and Founder of Adwait Foundation® and Adwait Yoga School.

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